संवाददाता रूपेश कुमार
हस्तिनापुर / विशेष रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक नगर हस्तिनापुर में पिछले सात वर्षों से गुजर-बसर कर रहे एक घुमंतू लोहार परिवार ने शासन-प्रशासन से अपने और अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने की गुहार लगाई है। लगातार विस्थापन का दर्द झेल रहे इस परिवार ने मांग की है कि उन्हें रहने के लिए स्थाई ठिकाना (आशियाना) और पहचान से जुड़े जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराए जाएं।
बार-बार उजड़ने का दर्द और अनिश्चितता का जीवन
परिवार के सदस्यों का कहना है कि वे पिछले सात सालों से हस्तिनापुर क्षेत्र में ही मेहनत-मजदूरी कर अपना और अपने बच्चों का पेट पाल रहे हैं। लेकिन, कोई पक्का ठिकाना न होने के कारण उनकी झुग्गी-झोपड़ियों को समय-समय पर हटा दिया जाता है, जिससे उन्हें बार-बार खुले आसमान के नीचे या अन्य स्थानों पर भटकना पड़ता है। इस अनिश्चितता के कारण उनके जीवन में लगातार असुरक्षा बनी हुई है।
दस्तावेजों के अभाव में बच्चों की शिक्षा प्रभावित
लोहार परिवार की सबसे बड़ी चिंता उनके बच्चों का भविष्य है। पहचान पत्र और अन्य जरूरी कागजात न होने के कारण उनके बच्चों का स्कूल में दाखिला कराने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। परिवार का दर्द है कि उचित दस्तावेजों के अभाव में वे अपने बच्चों को पढ़ाने-लिखाने और बुनियादी सरकारी योजनाओं का लाभ पाने से वंचित हैं।
प्रशासन से लगाई न्यायोचित उम्मीद
परिवार ने सरकार और स्थानीय प्रशासन से अपील की है कि उनकी इस मानवीय समस्या पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाए। उन्होंने मांग की है कि उन्हें शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं के तहत आवास या जमीन का कोई छोटा टुकड़ा उपलब्ध कराया जाए, ताकि वे अपने बच्चों के साथ एक स्थिर जीवन जी सकें और उन्हें शिक्षित कर सकें।
हस्तिनापुर के जागरूक नागरिकों और समाजसेवियों का भी मानना है कि समाज के इस अति-वंचित वर्ग को मुख्यधारा से जोड़ने और उनके बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रशासनिक स्तर पर सकारात्मक पहल की जानी चाहिए।
